सिन्दूर

सिन्दूर

भारतीय समाज मे सिन्दुर का बड़ा ही महत्व है। हिन्दू महिलायें इन्हें अपने माथ के पर धारण करती है। ऐसा माना जाता है कि यह सु्हागन का प्रतिक है। सुहागन महिलायें को सिन्दूर धारण करने के बाद उसके मनोभाव के उच्यता को सहज ही समझा जा सकता है। यह सुरक्षा तथा विश्वास के मानसिक स्तर को बढ़ा देता है। भारतीय समाज मे सिन्दूर की एक गहरी भावनात्मक समझ की स्थापना हो चुकी है।

एक विवाहिता को समाज मे सिन्दूर के स्थापित भाव को बनाये रखने के लिए एक दवाव होता है। विवाहित महिला के प्रति लोगो के सम्मान के भाव के लिए एक अलग मर्यादा की रेखा को खिची गई है जिसके अनुपालन के बाद समाज को सशक्त होने का बल मिलता है। सिन्दूर धारण करने तथा इसके सम्मान के भाव जो मन मे गढ़े जाते है, उससे रिस्ते मे संयुक्त होने का प्रभाव समाज के प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। लोगो का आचरन तथा व्यवहार दोनो मे बदलाव हो जाता है। एक जिम्मेदारी का एहसास के साथ विवाहित महिलाओ का अपना एक अलग ग्रुप बन जाता है।

सिन्दूर का भावनात्मक संबंध के अलावा इसका बैज्ञानिक महत्व भी है। मन मे बनने वाला भाव हमारे अंदर संचालित होने वाले जैविका क्रिया को भी नियंत्रित करता है। मन के अंदर संयुक्त होने का भाव मन के उद्विग्नता को रोकता है। मन को एक याद के सहारे स्वयं मे समेट लेता है। जिससे व्यक्ति समय के साथ जिना सिख लेता है। अनिद्रा, सिर दर्द, याद्श्त की कमजोरी, चिड़ापन जैसी समस्या का सामना नही करना पड़ेता है।

रिस्तो की गहराई को मापने का भी इससे भावनात्मक संबंध होता है। सिन्दूर से बिलगाव के भाव को स्पष्ट रुप से समझा जा सकता है। बदले मन की बृति मे सिन्दूर के व्यवहार को भी अंतर कर देता है। दिल को संयमित, तथा नियंत्रित करने का ये समाजिक व्यवहार अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। भारतीय समाज के बैधिक उच्यता मे इसका भी अमुल्य योगदान है। हम इसके व्यवहार की सराहना करते है। बदलते समाजिक परिवेश मे भी यह प्रमाणिक बना रहे इसकी कामना हम करते है। जिससे समाजिक मुल्य को चिरकाल तक स्थापित करते हुए मानव बिकाश के लक्ष्य को समझा जा सके।

हे मानव दृष्य तथा अदृष्य तत्व से बना ये शरीर ईश्वर की अनुपम कृति है। इसमे बिकाश की अनंत संभावना छिपी हुई है, जरुरत है अपने आपको परिस्थिके के साथ संबंध स्थापित करते हुए सफलता के सोपान को प्राप्त करना। बनते बिगरते इस तन के अंदर समाहित आत्मा की शक्ति मे लगातार बदलाव होते रहता है। इस स्थापित शक्ति के अनुरुप ही मानव को पुनः शरीर प्राप्त करना होता है जिससे की वह अपना संवर्धन कर अपने लक्ष्य को पा सके और ईश्वर के लक्ष्य को क्रियांवित करने मे अपना योगदान दे सके। तुम तो अपने समाज के प्रति जावावदाही को सशक्त तरीके के साथ समायोजित होते रहो तुम्हारा समस्त कल्याण होगा और तुम याद किये जाओगे।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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By sneha

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