सत्य कहां मिलेगा

सत्य कहां मिलेगा

सत्य कहां मिलेगा लेख

सत्य के खोज मे निकला व्यक्ति वस्तुतः स्वयं को ही खोज रहा होता है। स्वयं को व्यवस्थित करने के लिए वह अपना राह तलास रहा होता है। भटकाव का कारण गुण की प्रखरता का नही होना होता है। गुण के प्रखरता मे कमी होने के कारण उसका समायोजन सही से नही होगा। जिससे की उसके सम्मान मे कमी होगी। इसी कमी को पुरा करने के लिये उसको तोड़ जोड़ करना परेगा। इससे उत्पन्न व्यवस्था मे वह उलझता चला जायेगा। उपलब्ध परिस्थिती का लाभ लेता वह इस कदर उलझ जायेगा कि एक दिन वह स्वयं को खोजने निकलेगा।

   सत्य तो नित के साथ चलता है। भटकाव का कारण मानव का भाव प्रधान कार्य का समायोजन होता है। साधित मन तो भटकना जानता ही नही है। इसलिए वह सत्य के करीव रहता है। भटकाव का कारण व्यक्ति का, नव श्रीजित भाव भंगिमा मे चला जाना होता है, जिसका की वास्तविक नियोजन नही होता है। बिचार का वास्तविकता के साथ संयोजन का चलना सत्य की धारा का बना होता समझा जाता है।

मृग तृष्णा मे लगा हुआ व्यक्ति को यह आभास ही नही होता है कि वह वास्तविकता से कितना दुर चला जा रहा है। जब उसके कौशल के प्रखरता का समय आता है तो वह अपने को वास्तविकता से वहुत दुर पाकर सत्य की खोज मे निकलता है। वस्तुतः उसने अपनी यात्रा की शुरुआत ही मिथ्या से किया जिसका अंत उसे ऐसा मिला।

जिस दिन, जिस समय उसे नित के साथ समायोजन का भान होगा या वह नित से साथ चलना सिख जायेगा उसको सत्य का ज्ञान होने लगेगा। उसके वास्तविक गुण के कौशल का प्रकाश उसे एक आदर्श व्यक्ति के रुप मे स्थापित करेगा। उसको अनुसरण करने वालो को एक अनुकरणिय राह रौशन दिखेगा। जिसपर चलकर लोग आगे निकलने लगेगें। कहते है अनुभव व्यक्तिगत होता है। ज्ञान बांट सकते है, अनुभव नही। अनुभव तो आपको वही मिलेगा, जो आपका वास्तविक कौशल होगा। क्योकि उसका समायोजन वास्तविक होगा।

सत्य से ही जीवन है। प्रकृत यदि सत्य के राह पर हो तो जीवन कि कल्पना व्यर्थ होगी। एक अति सुक्ष्म से लेकर अति बिशालकाय तक के बस्तु का गुण होता है और उसका अपना समायोजन होता रहता है। एक बस्तु को कभी सत्य की खोज नही करना परता है। क्योकि उसमे भाव नही होता है। वह तो सत्य से ही समायोजित होकर संचरित होता रहता है।

हे मानव सत्य के प्रकाश की लौ कभी बुझती ही नही है। बुझता है तुम्हारा मानसिक आवेग। तुम्हारे मानसिक आवेग का संवेग हर बार एक समान नही रहता है जिस कारण तुम्हे सत्य का आभास नही होता है। तुम तो वही करो जो तुम कर सकते हो। एक दिन तुम्हे तो सत्य के दिपक के पास आना ही होगा क्योकि तुम्हारे कल्याण के मार्ग तो वही से निकलेगा। सत्य का जलता दिपक अनवरत बुझता तथा जलता है। इसका अपना गणित है, जो शास्वत है, नित है। तुम माया के काया के बासी हो तुम दिव्य हो जबकी काया स्थूल है। इस स्थूल के साधना से ही तुम्हे सत्य का ज्ञान होगा। गरु कृपा के अधिन होकर साधना को सतगति से प्राप्त करो। तुम्हारा सदा कल्याण होगा। यह हिन्द

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By sneha

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