


गुरुर
खुद पर गुरुर का होना बड़ी बात है। यदि व्यक्ति समय के साथ चलते हुए बड़े निष्ठा के साथ कार्य करते हुए आगे बढ़ता है और पुरी ततपरता के साथ लगा हुआ है तो कहता है कि हमे खुद पे गुरुर है। इसका अभिप्रय यह होता है कि व्यक्ति मे कार्य को सही से करते हुए आगे बढ़ने के प्रति सतर्क है। वह सावधानी के विधान को सही से जानता है। उसके कार्य करने की शैली अगल है जिससे की वह इतने विश्वास के साथ ये बात कह रहा है।
गुरुर और घमंड मे अंतर होता है। घमंड ये कहता है कि मेरे सिवा कोई इस काम को नही कर सकता है। इस कार्य को करने मे उसका घमंड हावी होता है। कहा जाता है कि समय के साथ सबकुछ बदल जाता है और व्यक्ति अपने कार्य के लिए किसी का मोहताज हो जाता है तो उसके कार्य मे वाधा आती है। इसी कारण से घमंड नही करना चाहिए। पर गुरुर तो एक गुणकारी भाव को रखने और कार्य को वड़ी ही सिद्दत से करने वालो को ये पारीतोषिक प्राप्त है।
साहसिस कार्य को करने के लिये भी बड़े बुजुर्ग कहते है कि हमको इसके उपर गुरुर है। इस तरह से कार्य को कुशलता को निर्दशित करता ये वाक्य खास तरह के कार्य के लिए दिया जाता है। स्वयं को उर्जावान बनाने तथा कार्य को करने की कार्य क्षमता के उत्तरोत्तर विकाश के लिेए ये जरुरी है।
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