जीवन के पार चलो

Jivan ke par chalo

जीवन के पार चलो

जीवन के पार देखने वाला दृष्टि पाकर व्यक्ति अहलादित हो सकता है। आन्दित हुए व्यक्ति सतमार्ग पर चलना शुरु भी कर सकता है, लेकिन उसके लक्ष्य तक पहुँचने मे आने वाली वाधा को पार जाने की शक्ति समर्थ का होना भी जरुरी है। इसका पुर्व पुर्ण ज्ञान होना संभव नही है। इसके लिए तो व्यक्ति का संकल्प शक्ति ही याचक बन सकता है। यही वो शक्ति है, जो व्यक्ति को पार जाने के लिए यथेष्ट बल को नियोजित कर बाधा से पार ले जायेगा। हमारे शरीर के अंदर बिभिन्न धटको मे बल समाहित है, जिसका यथोसमय नियोजन होता है। यह नियोजन हमारे साधना शक्ति पर निर्भर करता है।

जैसे भौतिक शक्तिः इसको जागृत करने के लिए नीत अभ्यास की आवश्यकता होती है, जिससे यह सुदृढ़ होकर यथासमय कार्यानुकुल हमारे लिए उपलब्ध होता है। इसके मान, बिधान तथा उत्कर्ष का भी ख्याल रखना होता है।

जीवन धारा शक्तिः हमारा शरीर हमेशा पार्यावरण के साथ संतुलन की अवस्था को बनाये रखकर संचालित होता रहता है। इसलिए हमे अपने पार्यवरण के अनुरूप जीवन धारा को बनाये रखने के लिए जरुरी उपाय करना होता है। जैसे भोजन, दवा, योग,

परिष्कृत शक्तिः इसको हम अपने जीवन काल मे हांसिल करते है। यह हमारे गुण धर्म के कारण हमारे आभामंडल को बढ़ा देता है। यह शक्ति हमे अंदर तथा बाहर दोनो जगह विस्तारित होता रहता है। यह हमारे शील पर निर्भर करता है।

उत्कृष्ट शक्तिः- काम, क्रोध, लोभ, मोह, दया, तृष्णा तथा क्षमा आदि उत्कृष्ट शक्ति है। इसका परिशोधन हम अपने शरीर मे चिंतन मनन द्वारा करते है। हमारे शरीर के अंदर ही शक्ति की पराकाष्ठा पुष्पित पल्लवित होती रहती है। इसकी विशालता का पता हमे समय के साथ होने वाले हमारे व्यवहार से पता चलता है।

परा शक्तिः यह अत्यंत दुर्लभ शक्ति है। इसको पाने के लिए गुरु के सानिध्य मे दिव्य साधना के साथ करना पड़ता है, जिसके बाद यह प्राप्त होता है। इसमे हमे काल के अधिन होने वाले धटना की जानकारी तो होती ही है, उसका उचित उपाय के साथ अदृष्य शक्ति भी मिलती है।

उपरोक्त वल के उपयोग के आधार पर हमारे जीवन की यात्रा का अंतिम पड़ाव आता है। यह अंतिम पड़ाव हमारे जीवन के मुल्यांकन का समय होता है। हमे नाम, यश, सम्मान तथा सेवा आदि हमारे कर्मो के अनुरुप ही प्राप्त होता है। हमारे अंदर का जागृत विवेक हमे सबकुछ अनुभव कराता है। लेकिन यह समय सुधारने का नही वल्कि अनुभव करने का होता है। यहां हमे यह ज्ञात हो जाता है कि हमारे अंदर क्या कमी रह गई। आने वाले जीवन की कल्पना भी यही से जन्म लेने लगती है। यदी कोई कामना शेष है, तो उसका गुव्वार भी यहां बनने लगता है। यही शक्ति हमारे आत्मिय शक्ति के भाव को संग्रहित करता है। हमारे अत्मिय भाव ही हमारे अगले जन्म को निर्धारित करता है। हमारे कामना का बेग जितना होगा हमारा आने वाला जन्म का संवेग भी वही तय करेगा।

कामना रहित व्यक्ति का होना सामान्य मानव के अधिन नही है। क्योकि कामना मे तो अल्प आनन्द छिपा होता है। इस क्षणभंगुर अल्प आनन्द के लिए ही वयक्ति व्यथित रहता है। क्योकि यदि उसका शरीर साधित नही है, तो वह इसके अलावे कुछ सोच भी नही सकता है। उसका जीवन भी यहीं तक सिमित रहता है। कामना रहित व्यक्ति बनने के लिए दिव्य योग जरुरी है। इसको पाने के लिए व्यक्ति को भौतिक साधनो का यथासंभव त्याग करना होता है। जिससे की वह अपने अंदर दिव्य आनन्द को पाप्त कर सके। कहते है कि जहां कुछ नही है वहां हवा है जब हवा निकलती है तो दुसरी वस्तु अपना स्थान पाता है। ब्रम्हाण्ड मे भी एक सतत पाये जाने दिव्य कण की कामना बैज्ञानिकों ने की है। इसी प्रकार शरीर भी कभी खाली नही रहता है। एक भाव हटता है कि दुसरा भाव प्रकट होने लगता है। यह हमेशा चलता रहता है। इस बृति को सम्यक नियोजन के बाद ही जीवन के पार जा सकते है।

सर्वगुण संपन्न होना संभव भी नही है इसलिए हमे एक गुण मे ही परांगत होना चाहिए, जो हमारे जीवन को अर्थ पुर्ण बना दे। यहां से हम अपने जीवन के स्वतः स्फुर्त रुप से आगे जाने वाला देख सकते है। यदि सबकुछ प्राकृति के संयोग से ही चल रहा है, तो आपका आनेवाला जन्म मे आत्मिय शक्ति की बिशिष्टता नही रहती है। आप अपने पुर्व जन्म के योग से पाप्त जीवन को जी चुके होते है। वर्तमान जीवन के सहज रुप से व्यतीत होने के वाद उसका हल निकालना मानव के अधीन नही है। क्योकी सारी शक्तियो का समायोजन करने वाला तंत्र हमरे पास नही है। यह तो प्राकृति ही आपने सिद्धान्त से करती है। इसलिए गीता मे कहा गया है कि हे मानव तुम कर्म करो कर्म फल तुम्हारे अधीन नही है। कर्म फल की चिंता छोड दो।

कर्म फल यदि हमारे कर्मो के समायोजन से ही आना है, तो हमारा श्रेष्ट कर्म हमे यथेष्टा बनायेगा इसका अनुमान तो हम लगा ही सकते है। कुछ लोग कामना के प्रवाह मे इस कदर रहते है कि उन्हे ये बात बेकार लगती है। क्योकि उनको अभी एक लम्बी यात्रा करना है। कामनाओ के भोग के बाद यदि व्यक्ति की आत्मा विवेकी होगा, तभी यह क्षण उसके काम आयेगा। अन्यथा दिव्य ज्ञान उन्हे फालतु लगेगा।

जीवन के पार जाने के लिए दिव्य ज्ञान ही एक मात्र सहारा है। ज्ञान के सहारे ही आज असंभव सा दिखने वाला कार्य  संभव हो रहा है। ज्ञान की बात चली है तो जीवन को ज्ञान के धारा के साथ जोड़ने का कर्य भी व्यक्ति को स्वयं ही करना परता है। ये तो आपके प्ररव्ध से आता है। आपको अपने कल्याण का मार्ग स्वयं ही खोजना होगा। यही आपको संतुष्टि भी देगा।

जीवन के पार जाकर हमे आत्मिय समय को एक निश्चित समय तक गुजारना होता है। इसके बाद पुनः हमे जीव तन मे आऩा होता है। जीव का तन ही शक्ति समवर्धन के लिए उपयुक्त है। साधन के बिना साधना और साधना के बिना शक्ति संचय नही हो सकता है। इसलिए यह जीव तन बड़ा ही उपयोगी है। इस जीव तन मे चेतना को जगाकर उतकृष्ट कार्य करते हुए आत्मिय शक्ति को संचय करना होता है जिससे की मुक्ति धाम जाकर एक लम्बे समय तक आत्मिय सुख का आनन्द पा सके है।

   शरीर छोड़ने के बाद यदि कामना का प्रचंड बेग दवा हुआ रह जाता है तो उस उन्मादि बिचार के कारण आत्मा का स्वभाव उसके अनुरुप पचंडता को पाप्त करता है।

एक धटना से इसे समझा जा सकता है। एक बार देवी देवता के जानकार व्यक्ति के घर मे एक परिवारीक श्रेष्ट व्यक्ति की मृत्यू हुई। देव शक्ति के जानकार होने के कारण कुछ दिन बाद वह श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी भौतिक कामना को आत्मिय जीवन मे भी महसुस करते हुए परिवार के अऩ्य सदस्य को परेशान करने लगा। काफी जिद्दोजहद के बाद संयम का ठौर चला। हमने इस धटना की पड़ताल की तो एक दुसरे देव शक्ति से पता चला की कामना के बेग से ग्रसित ब्यक्ति यदि मुत्यू को प्राप्त करता है और वह परा शक्ति की समझ रखता है तो अपने करीबी को परेशान कर सकता है। जैसा की देखा जा रहा था। समाधान पुछने पर वह देव शक्ति बोली की भौतिक देह त्यागने के 12 साल बाद उस आत्मा उन्मादि शक्ति कम हो जायेगी। लेकिन कामना रहित दिव्य साधक के मृत्यू को प्राप्त करने वोलों पर यह नियम लागू नही होता है।

हमारे 12 साल के अवलोकन के बाद यह पाया गया की बात सत्य थी। लेकिन उसके पुर्ण स्थिर होने का प्रमाण नही मिला। यहां यह भाव आता है कि खुलकर जीयो जो चाहते हो करो। आपनी चाहत को छुपाकर नही बल्की साधना से उससे निर्मुलतः मुक्त हो जाओ। यह तथ्य तुम्हारे स्वभाव से झलकना चाहिए तभी तुम सही समझे जाओगे। खुलकर जीने का अर्थ है, कामना के प्रवाह के परिणाम तक पहुँचकर उसका समायोजन कर लेना। इसके बाद जीव के जीवन मे होने वाला अनुभव हमारे चेतना को जागुत करके हमे यथेष्ठ बनता है। सिर्फ समझ लेने से कार्य नही होता है। समझने साथ ही, कार्य मे वह परिणत होकर हमारे स्वभाव को परिणत करता हुआ बनकर हमे शुद्ध भी होना होता है। यही हमारे आत्मा का गुण बनने वाला है।

कामना रहित होने की एक घटना भी आती है। एक बारह साल के आसपास का बच्चा बड़ा शरारती था। उसके शरारत से आसपरोस के लोग बड़ा परेशान रहते थे। उनके माता पिता उसका समाधान चाहते हुए एक दिन एक दिव्य साधक के पास गया तथा इसका उपाय पुछा। दिव्य साधक ने उसे समझाया तथा कहा सतकर्मो के मार्ग मे लग जाओ तुम्हारा समर्ग कल्याण होगा। कुछ दिन के संयम के कारण उनके माता पिता ऩे उसे अपने शहर से बाहर कार्य करने के लिए भेज दिया। वहां उसके संगति उसके शरीर जनीत मुल स्वभाव के लोगो से होने के कारण वह कई तरह के गलत कार्यो मे लग गया, और एक दिल पुलिस के गोली का शिकार हो गया। मुत्यू के कुछ दिन बाद वह आपनी आत्मीय शक्ति के रुप मे अपने गुरू के पास पहुँचा और कहा मैने 11 बार इस तरह की आकाल मुत्यू को प्राप्त किया है। यह मेरा और आपके द्वारा दिये गये दिव्य ज्ञान के आत्सात का अंतिम समय था। अब हम आने वाले जन्म मे एक अच्छे व्यक्ति के रुप मे जन्म लेंगे। उन्होने गुरु द्वारा दिये गये ज्ञान को आत्मसात किया था वह उसके आत्मा का गुण बना तथा पुर्व कर्म के कारण जो शरीर मिला था उसका उन्होने उसी रुप मे त्याग कर दिया।

बन्धुगण आपको यह प्रसंग सुनाने का मतलब हमारे बिचार को स्पष्ट करना था जिससे कि हम जीवन के पार देख सके। मानव मुल्य की स्थापना हो सके। जीवन के पार हम अपना तो कल्याण कर ही सकते है, समाज का भी कल्याण इसमे निहित है, क्योकी कर्मयोगी के सतमार्ग को लोग दृष्टांत मानकर स्वयं के जीवन मे आगे बढ़ने की प्रेरणा लेते रहते है। अभ्यास साधना तथा सतत प्रयास को अपनाकर इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। यह एक पर आनन्दायी सुखद अनुभुतिक योग है जो खास लोगो को ही प्राप्त होता है। इस योग को जानने के लिए वहुत कठिन साधना की जरुरत है। लेकिन यदि इस मर्म को आप समझ चुके है तो अपना कार्य आरम्भ कर सकते है। मार्ग मे आनेवाली बाधा का समाधान होता भी समय के साथ हो जायेगा।

नोटः- आप अपने समझ से यदि बिषय पर कुछ कहना चाहे तो आपना बिचार कॉमेंट बॉक्स मे जरुर लिखे जिससे की लोगो को बिचार की बारीकी को समझने मे मदद मिले और आपको उनका आत्मिय प्यार प्राप्त हो। जय हिन्द।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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By sneha

2 thoughts on “जीवन के पार चलो

  • Subodh shastri -

    गजब सानदार आप तो एक सानदार कवि हैं सर जी लेकिन एक अच्छा मित्र भी हैं हमारा

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