महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि लेख

भगवान भोलेनाथ के बैराग्य को माता पार्वती ने अपने तपोवल की शक्ति से तोड़कर उनको अँगीकार कर लिया। भगवान ने जीव जगत वासी के लिए शायद यह लीला रची हो। लेकिन जनमानस के लिए आज भी उनका यह कार्य याद किया जा रहा है। कहते है कि पुजा तो गुण की ही होती है। माता पार्वती के आलौकिक दृष्टि मे शिव शक्ति के जो गुण दिखे हो। हम जगत वासी के विए तो उनके हर गुण महान ही दिखते है।

काल तथा परिस्थिती के अनुरुप महादेव के शक्ति धारण तथा समस्या निवारण कि चर्चा समस्त ब्रम्हाण्ड मे चलती रहती है। मानव के आराध्य भगवान की लीला जीव वासी के लिए अनुकरणीय होता है। भाव प्रधान इस आलौकिक भाव को समझना भी आसान नही है। दिव्य साधना के द्वारा जो तथ्य साधक ने हम तक पहुँचाया है हम उसी का गुणगाण करते है। वास्तविक का कल्पना लगाना भी दुर्लभ है।

ऋषि मुनियो के काफी शोध के बाद ये पता चला की मध्यम मार्ग ही जीव कल्याणकारी है। इसलिए इसको समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक प्रचारित प्रसारित किया जाय। हमारे संस्कृति की उन्नत भुमि ने हमे यह जो बिधान दिया है हम सभी उसका गुणगान करते आ रहे है। इसकी गहराई का अंदाज लगाके देखेगे तो पायेंगे कि भाव के गहरी पैठ रखने वाले भी इसकी तोड़ नही निकाल पाते है। इसलिए आज हमारा धर्म हमारे लिए उत्कृष्ट बना हुआ है। इसमे बिकाश की अपार संभावना छिपी है।

  आनेवाले पिढ़ी को जो हमे देना है वह हम उसे व्यवहार से ही सिखाते तथा अभ्यस्त कराते जाते है। इसके बाद वह जो दृढ़ता पाता है उससे ही हमारे संस्कृति को सर्वोच्य स्थान मिलता है। बिज्ञान की उन्नत भुमि वही जाकर ठहरेगी जहां से हमारे ऋषि मुनी गुजर चुके है।

महाशिवरात्रि का पर्व शिव पार्वती के मिलन का समय है। इसके बाद ही हमे भगवान गणेश तथा कर्तिकेय के पुजा का सौभाग्य प्राप्त होता है। गृहस्थाश्रम के हर पल को बड़े ही योगपुर्ण तरीके से उकेरा गया है। ज्ञान का अपार भंडार इसमे छिपा है। आप जिस भाव से खोजेंगे आपको जवाव इसमे मिल जायेगा।

दिव्य शक्ति को याद करते हुए साधना का मार्ग अपनाकर उपवास के इस पल को प्रगाढ़ आस्था के उत्वेग को आप तक पहुँचा रहा हुँ। आपके मानस पटल पर जो दिव्य रुप लौकिक होगा उससे अपका पुरा कल्याण होगा। यह काव्य रचना एक उदधोष है जो आपको उद्वेलित कर आपके आशक्ति को प्रगाढ़ कर देगा। ये लेख आपको आपके ही वारे मे समझा रहा है। कर्तव्य के मार्ग को रौशन करता है।

हे मानव जीवन के समुन्नत मार्ग तो भाव ही है जो स्वध्याय से दृढ़ हो जाता है। अभ्यास से नित हो जाता है। प्रसार से गरीमामय हो जाता है। यह सबमे समान रुप से व्याप्त है। इसके जिस रुप को आप धारण करोगे फल भी वैसा ही होगा। इसलिए अपने संसकृति के धारा के साथ भाव पुर्ण आस्था को बनाये रखकर जीवन जीते जाओ तुम्हारा कल्याण ही होगा। आज का महाशिवरात्री का ये पर्व हमे युगल दापत्य जीवन की गहरे रहस्य को समझा रहा है। इसे अपने जीवन मे उतारो तथा परम सौभाग्य का भागीदार हो जाओ। जय शिवशक्ति।

नोठः- यह काव्य लेख आपके बिचार के लिए प्रेषित है आप अपना बिचार कॉमेट बॉक्स मे छोड़ सकते है जो पाठक को मार्गदर्शन करेगा। आपको मेरा नमस्कार।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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By sneha

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